दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा बिधिपुर आश्रम में सतसंग सभा का आयोजन

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जालंधर (विजय गाबा)  दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा बिधिपुर आश्रम, अमृतसर रोड में सतसंग सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या साध्वी पंकजा भारती जी ने प्रवचन करते हुए भक्तो के समक्ष अपने विचारों को रखते हुए कहा कि एक गुरू ही है जो एक भक्त के जीवन में अंधकार ना देखते हुए उसे प्रकाश की और अग्रसर करता है। उसकी मनबुद्धि को समाप्त कर उसे सद्बुद्धि प्रदान करने वाला एक गुरू ही है। एैसे गुरू के स्मर्ण मात्र से ही दुख, दरिद्र, कलेश, डर इत्यादि सभी मुशकिले खत्म हो जाती है। लेक्नि आज संसार में हम देखे कि आप को सभी प्रमात्मा के भक्त ही दिखाई देगें। लेक्नि सोचने वाली बात यह है कि उन्के जीवन में जो होना चाहिए वह नही है और जो नही होना चाहिए वह उन्के जीवन में है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान प्रभु की भक्ति तो कर रहा है पर उस भक्ति के रास्ते पर चल नही रहा है। जिस पर चल कर उस जगत के पालक के दीदार हो सके और उस के जीवन में परिर्वतन आ सके। क्योकि आज के इंसान ने प्रमात्मा को केवल मात्र मानने तक ही सीमित कर रखा है। लेक्नि जो प्रभु प्रकाश रूप में इस संसार में रमण करतै है और उस प्रकाश रूप को इन बाहरी नेत्रो के द्वारा नही देखा जा सकता। आगे साध्वी जी ने बताया कि इंसान को मानने तक ही सीमित नही रहना चाहिए उसे उसे कण-कण में बिचरण करने वाले प्रभु को अपने घट में प्रकाश रूप में देखने के लिए भी अग्रसर होना होगा। प्रमात्मा को मानना ही केवल मात्र उस प्रभु की भक्ति नही कहलाता है। हमारे इतिहास में एैसे बहुत से पात्र है जो कि भगवान के ही उपासक थे और स्वयं प्रभु ने ही उन्हे अपने आपको प्रकाश रूप में देखने के लिए एक गुरू, एक संत की शरण में जाने के लिए कहा और वह गए भी और उन्होने अपने जीवन को धन्य कर लिया। आज यही शर्त हम पर लगती है कि प्रमात्मा को केवल मात्र पुजा तक ही सीमित मत करो उसे जानने का प्रयास भी करो। क्योंकि जब तक हमने उस प्रभु का अपने घट में दर्शन ही नही किया जा फिर उस प्रभु के स्वरूप देखा ही नही है तो तक हम सही मायने में प्रभु कृप्पा को प्राप्त नही कर सकते। उस प्रकाश रूप को जानने के लिए हमें जरूरत है एक एैसे तत्वदर्शी संत की जिस की कृप्पा से हम अपने घट में उन अलौकिक व दिव्य दशनों को प्राप्त कर सके। क्योकि इतिहास गवाह है कि इस संसार के भेद और इस में रमण कर रही शक्तियों को जब भी किसी ने जानने की कौशिश की तब-तब उसे रास्ते में उसे उस मार्ग पर चलाने वाला एक मार्ग दर्शक मिला जिसे हमारे धार्मिक ग्रंथो ने गुरू की उपाधी दी है। संसार में एक गुरू ही है जो करता है करने के योगय है उस की जगह कोई और नही कर सकता। गुरू ही एक मानव को उस के जन्मो जन्मों से बिछुडे उसे मुल रूप से मिलवाता है। गुरू ही एक इंसान को नश्वरता से अनश्वरता की और लेकर जाता है। जैसे हम संसार में देखते है कि एक विवाह को करवाने के लिए दो परिवारो को एक करने के लिए बिचोले की जरूरत पढती है ठीक एैसे ही इस संसार में इस मानव शरीर के भीतर जो आत्मा है उस आत्मा रूपी दुलहन को उस प्रमेशवर रूपी दुल्हे के साथ मिलवाने के लिए गुरू एक बिचौले का काम करता है। संसार के रिशतो की कोई गारंटी नही है लेक्नि गुरू तो प्रमात्मा से आत्मा का रिशता सदा सदा के लिए जोड देता है। इस लिए हमें भी प्रभु के प्रकाश रूप में दर्शन करने के लिए एक एैसे ही गुरू की अवश्यक्ता है जो हमें प्रमात्मा का दर्शन हमारे घट में ही करवाकर हमारा जीवन प्रकाश से भर दें।

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